📿 श्लोक संग्रह

सर्वभूतेषु येनैकम्

गीता 18.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
सर्वभूतेषु
सब प्राणियों में
एकम् भावम्
एक भाव — एक सत्ता
अव्ययम्
अविनाशी — अपरिवर्तनीय
ईक्षते
देखता है
अविभक्तम्
अविभाजित — अखंड
विभक्तेषु
विभाजित जीवों में
सात्त्विकम्
सात्त्विक — सत्त्वगुण से युक्त

सात्त्विक ज्ञान क्या है? भगवान कहते हैं — वह ज्ञान जो सब प्राणियों में एक ही अविनाशी सत्ता को देखे। बाहर से सब अलग-अलग दिखते हैं — पर भीतर एक ही प्रकाश है। यही देखना सात्त्विक ज्ञान है।

यह ज्ञान बहुत सरल अनुभव की भाषा में है। जब हम किसी दुखी इंसान को देखकर अपना दुःख महसूस करें, जब किसी खुशी को अपनी खुशी जानें — यही सात्त्विक ज्ञान की झलक है।

यह श्लोक अद्वैत-दर्शन की मूल दृष्टि को सरल भाषा में कहता है — सब में एक। यीशेशता और एकत्व — दोनों एक साथ।

गीता के तेरहवें अध्याय में भी 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ' के माध्यम से यही एकता का बोध दिया गया था।

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