📿 श्लोक संग्रह

तत्रैवं सति कर्तारम्

गीता 18.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥
तत्र एवं सति
ऐसा होने पर — इस स्थिति में
कर्तारम् आत्मानम्
आत्मा को कर्ता
केवलम्
अकेला — केवल
अकृतबुद्धित्वात्
अशुद्ध बुद्धि के कारण
न पश्यति
नहीं देखता — वास्तविकता नहीं जानता
दुर्मतिः
दुर्बुद्धि — मंद बुद्धि वाला

भगवान कहते हैं — जब ये पाँच कारण हैं, तब जो व्यक्ति केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है — वह दुर्बुद्धि है, वह सही नहीं देखता। यह अहंकार का सबसे घना रूप है।

हम अक्सर कहते हैं — 'मैंने यह किया।' गीता कहती है — यह अधूरी बात है। हाँ, तुमने किया — पर तुम्हारा शरीर, तुम्हारी इंद्रियाँ, परिस्थितियाँ, और ईश्वरीय विधान — सब मिलकर काम कर रहे थे।

यहाँ 'अकृतबुद्धि' का अर्थ है — अपरिपक्व बुद्धि। जो बुद्धि केवल एक आयाम देखती है, वह पूरी तस्वीर नहीं पकड़ पाती।

अगले श्लोक (18.17) में भगवान बताएँगे — जो अहंकार-रहित है, वह सब कुछ करते हुए भी बंधन में नहीं पड़ता।

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