📿 श्लोक संग्रह

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्

गीता 18.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
शरीरवाङ्मनोभिः
शरीर, वाणी और मन से
यत् कर्म
जो भी कर्म
प्रारभते
आरंभ करता है
नरः
मनुष्य
न्याय्यम्
उचित — धर्मसम्मत
विपरीतम्
विपरीत — अधर्म
पञ्च एते
ये पाँच ही
हेतवः
कारण हैं

भगवान कहते हैं — मनुष्य शरीर से, वाणी से, या मन से जो भी कर्म करे — चाहे वह उचित हो या अनुचित — उन सब के पीछे ये पाँच ही कारण काम करते हैं।

यह बहुत बड़ा कथन है। अच्छे-बुरे, धर्म-अधर्म — हर कर्म में ये पाँच घटक होते हैं। इसलिए कोई भी अकेला पूर्ण रूप से 'कर्ता' नहीं है।

यह श्लोक 'तीन माध्यम' — शरीर, वाणी, मन — का भी उल्लेख करता है। कर्म केवल हाथ-पैर से नहीं होता; मन में सोचना और वाणी से बोलना भी कर्म है।

अगले श्लोक में भगवान बताएँगे — जो इन पाँच कारणों को नजरअंदाज करके सिर्फ 'मैंने किया' सोचता है, वह भ्रमित है।

अध्याय 18 · 15 / 78
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