भगवान पाँच कारण बताते हैं — पहला, शरीर जो कर्म का आधार है। दूसरा, कर्ता जो कर्म करता है। तीसरा, इंद्रियाँ जो कर्म के साधन हैं। चौथा, विविध चेष्टाएँ। और पाँचवाँ — दैव, यानी ईश्वरीय शक्ति या भाग्य।
यह समझ बहुत गहरी है। जब हम कोई काम करते हैं, तो उसमें हम अकेले नहीं होते। पाँच शक्तियाँ मिलकर काम करती हैं। इसीलिए 'मैंने यह किया' — यह अहंकार अधूरा है।