📿 श्लोक संग्रह

अधिष्ठानं तथा कर्ता

गीता 18.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
अधिष्ठानम्
आधार — शरीर, आसन
कर्ता
करने वाला — जीव
करणम्
इंद्रियाँ — साधन
पृथग्विधम्
अनेक प्रकार की
चेष्टाः
क्रियाएँ — प्रयास
दैवम्
दैव — भाग्य, ईश्वरीय शक्ति
पञ्चमम्
पाँचवाँ

भगवान पाँच कारण बताते हैं — पहला, शरीर जो कर्म का आधार है। दूसरा, कर्ता जो कर्म करता है। तीसरा, इंद्रियाँ जो कर्म के साधन हैं। चौथा, विविध चेष्टाएँ। और पाँचवाँ — दैव, यानी ईश्वरीय शक्ति या भाग्य।

यह समझ बहुत गहरी है। जब हम कोई काम करते हैं, तो उसमें हम अकेले नहीं होते। पाँच शक्तियाँ मिलकर काम करती हैं। इसीलिए 'मैंने यह किया' — यह अहंकार अधूरा है।

पाँचवाँ कारण 'दैव' सबसे रहस्यमय है। इसे ईश्वरीय विधान, पूर्वजन्म के संस्कार, या समय-शक्ति के रूप में समझा जाता है।

इन पाँच कारणों की सूची अगले श्लोक (18.15) में कर्म की जिम्मेदारी का विषय उठाएगी।

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