📿 श्लोक संग्रह

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च

गीता 18.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥
अनिष्टम्
अनचाहा — अशुभ फल
इष्टम्
चाहा हुआ — शुभ फल
मिश्रम्
मिला-जुला — मिश्रित फल
त्रिविधम्
तीन प्रकार का
अत्यागिनाम्
त्याग न करने वालों के लिए
प्रेत्य
मृत्यु के बाद
संन्यासिनाम्
त्यागियों के लिए
क्वचित्
कभी नहीं — किसी भी हाल में नहीं

भगवान कहते हैं — जो लोग फल की चाहत के साथ कर्म करते हैं, उन्हें मृत्यु के बाद तीन में से एक फल मिलता है — अनचाहा, चाहा हुआ, या मिला-जुला। ये तीनों फल उन्हें बाँधते हैं।

पर जो सच्चे त्यागी हैं — जिन्होंने फल की इच्छा ही छोड़ दी — उन्हें मृत्यु के बाद किसी प्रकार का कर्म-फल नहीं मिलता। वे मुक्त हैं।

यह श्लोक कर्म-फल के सिद्धांत को संक्षेप में कहता है। फल की चाहत ही बंधन है — और उसका त्याग ही मुक्ति।

त्यागियों को 'क्वचित् न' — किसी भी हाल में नहीं — यह शब्द बहुत दृढ़ता से कहा गया है। यह गीता की मुक्ति-गारंटी है।

अध्याय 18 · 12 / 78
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