भगवान एक व्यावहारिक सत्य कहते हैं — जब तक शरीर है, कर्म बंद नहीं हो सकता। साँस लेना भी कर्म है। इसलिए 'सब कर्म छोड़ दूँगा' — यह संभव नहीं।
असली त्यागी वह है जो कर्म करता है, पर उसके फल की इच्छा नहीं रखता। यही परिभाषा गीता देती है। कर्म से भागना नहीं, फल की लालसा से मुक्त होना — यही सच्चा त्याग है।