📿 श्लोक संग्रह

न हि देहभृता शक्यम्

गीता 18.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
देहभृता
देहधारी के लिए — शरीरधारी के लिए
शक्यम्
संभव है
त्यक्तुम्
छोड़ना
अशेषतः
पूरी तरह — शेष रहित
कर्मफलत्यागी
कर्म-फल का त्याग करने वाला
अभिधीयते
कहा जाता है — पुकारा जाता है

भगवान एक व्यावहारिक सत्य कहते हैं — जब तक शरीर है, कर्म बंद नहीं हो सकता। साँस लेना भी कर्म है। इसलिए 'सब कर्म छोड़ दूँगा' — यह संभव नहीं।

असली त्यागी वह है जो कर्म करता है, पर उसके फल की इच्छा नहीं रखता। यही परिभाषा गीता देती है। कर्म से भागना नहीं, फल की लालसा से मुक्त होना — यही सच्चा त्याग है।

यह श्लोक गीता की सबसे व्यावहारिक शिक्षाओं में से एक है। कर्मयोग और संन्यास का जो भेद है, वह यहाँ बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है।

तीसरे अध्याय में भगवान ने कहा था — 'कोई भी एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता।' यह श्लोक उसी का विस्तार है।

अध्याय 18 · 11 / 78
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