भगवान कृष्ण अब एक नया विषय आरंभ करते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को जो भोजन प्रिय होता है, वह भी तीन प्रकार का है। इसी तरह यज्ञ, तपस्या और दान — ये सब भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं।
यह एक बहुत व्यावहारिक शिक्षा है। भगवान कह रहे हैं कि हमारे खान-पान से लेकर हमारे पूजा-पाठ और दान-धर्म तक — सब पर हमारे गुणों का प्रभाव पड़ता है। जो व्यक्ति जैसा भोजन खाता है, उसका मन भी वैसा ही बनता है।
भगवान अर्जुन से कहते हैं — इन सबके भेद को सुनो। आगे के श्लोकों में वे क्रमशः आहार, यज्ञ, तप और दान — सबको सात्त्विक, राजसिक और तामसिक श्रेणियों में बाँटकर समझाएँगे।