📿 श्लोक संग्रह

आहारस्त्वपि सर्वस्य

गीता 17.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥
आहारः
भोजन
तु
भी
अपि
भी
सर्वस्य
सबका
त्रिविधः
तीन प्रकार का
प्रियः
प्रिय
यज्ञः
यज्ञ
तपः
तपस्या
दानम्
दान
भेदम्
भेद / अंतर
शृणु
सुनो

भगवान कृष्ण अब एक नया विषय आरंभ करते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को जो भोजन प्रिय होता है, वह भी तीन प्रकार का है। इसी तरह यज्ञ, तपस्या और दान — ये सब भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं।

यह एक बहुत व्यावहारिक शिक्षा है। भगवान कह रहे हैं कि हमारे खान-पान से लेकर हमारे पूजा-पाठ और दान-धर्म तक — सब पर हमारे गुणों का प्रभाव पड़ता है। जो व्यक्ति जैसा भोजन खाता है, उसका मन भी वैसा ही बनता है।

भगवान अर्जुन से कहते हैं — इन सबके भेद को सुनो। आगे के श्लोकों में वे क्रमशः आहार, यज्ञ, तप और दान — सबको सात्त्विक, राजसिक और तामसिक श्रेणियों में बाँटकर समझाएँगे।

यह श्लोक अध्याय 17 के दूसरे बड़े खंड की शुरुआत है। पहले खंड (17.1–17.6) में श्रद्धा और पूजा का वर्णन था। अब भगवान आहार, यज्ञ, तप और दान के त्रिगुणात्मक विभाजन की ओर मुड़ते हैं।

आयुर्वेद में भी आहार को सत्त्व, रजस् और तमस् गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है — यह परंपरा गीता के इसी वर्गीकरण से प्रेरित मानी जाती है।

अध्याय 17 · 7 / 28
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