अध्याय के इस अंतिम श्लोक में भगवान कृष्ण एक निर्णायक बात कहते हैं — जो भी हवन, दान, तपस्या या कोई भी कर्म बिना श्रद्धा के किया जाता है, वह "असत्" (व्यर्थ) कहलाता है। ऐसा कर्म न इस लोक में फल देता है, न परलोक में।
यह पूरे अध्याय का सार है — श्रद्धा के बिना कोई भी कर्म निष्फल है। चाहे कोई कितना भी बड़ा यज्ञ करे, कितना भी कठोर तप करे, कितना भी विशाल दान दे — यदि उसमें श्रद्धा नहीं है, तो वह सब खोखला है।
श्रद्धा वह नींव है जिस पर सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन खड़ा है। बिना नींव के कोई भवन नहीं टिकता — वैसे ही बिना श्रद्धा के कोई कर्म फल नहीं देता। यही इस अध्याय की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है।