📿 श्लोक संग्रह

अश्रद्धया हुतं दत्तं

गीता 17.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥
अश्रद्धया
श्रद्धा के बिना
हुतम्
हवन किया गया
दत्तम्
दान दिया गया
तपः
तपस्या
तप्तम्
तपी गई
कृतम्
किया गया
असत्
असत् / व्यर्थ
उच्यते
कहा जाता है
पार्थ
हे अर्जुन
प्रेत्य
मरने के बाद
नो इह
और न इस लोक में

अध्याय के इस अंतिम श्लोक में भगवान कृष्ण एक निर्णायक बात कहते हैं — जो भी हवन, दान, तपस्या या कोई भी कर्म बिना श्रद्धा के किया जाता है, वह "असत्" (व्यर्थ) कहलाता है। ऐसा कर्म न इस लोक में फल देता है, न परलोक में।

यह पूरे अध्याय का सार है — श्रद्धा के बिना कोई भी कर्म निष्फल है। चाहे कोई कितना भी बड़ा यज्ञ करे, कितना भी कठोर तप करे, कितना भी विशाल दान दे — यदि उसमें श्रद्धा नहीं है, तो वह सब खोखला है।

श्रद्धा वह नींव है जिस पर सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन खड़ा है। बिना नींव के कोई भवन नहीं टिकता — वैसे ही बिना श्रद्धा के कोई कर्म फल नहीं देता। यही इस अध्याय की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है।

यह श्रद्धात्रयविभागयोग (अध्याय 17) का अंतिम श्लोक है। अध्याय अर्जुन के श्रद्धा-विषयक प्रश्न से आरंभ हुआ था और अब भगवान श्रद्धा-रहित कर्म की व्यर्थता बताकर इसे पूर्ण करते हैं।

पूरे अध्याय में भगवान ने श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप, दान — सबको तीन गुणों में बाँटा, और अंत में "ॐ तत् सत्" का उपदेश दिया। यह अंतिम श्लोक सबको जोड़कर एक सरल सत्य बताता है — श्रद्धा ही सबका मूल है।

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