भगवान कृष्ण कहते हैं कि यज्ञ, तप और दान में जो दृढ़ निष्ठा होती है, उसे भी "सत्" कहते हैं। और जो कर्म उस परम तत्व (ब्रह्म) के निमित्त किया जाता है, उसे भी "सत्" ही कहा जाता है।
इसका सुंदर अर्थ यह है कि "सत्" शब्द दो चीज़ों को व्यक्त करता है — पहला, शुभ कर्मों में स्थिर रहने का भाव; दूसरा, कर्म को ईश्वर के लिए करने का भाव। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में अडिग रहता है और सब कुछ ब्रह्म को अर्पित करता है — उसके कर्म "सत्" हैं।
जैसे एक दीपक लगातार जलता रहता है, बिना डगमगाए — वैसे ही शुभ कर्मों में स्थिर रहना "सत्" है। यह निष्ठा ही जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है।