भगवान कृष्ण कहते हैं कि "सत्" शब्द का प्रयोग सत्य-भाव और श्रेष्ठ भाव — दोनों अर्थों में किया जाता है। इसी प्रकार, किसी प्रशंसनीय कर्म के लिए भी "सत्" शब्द का प्रयोग होता है।
"सत्" का अर्थ बहुत व्यापक है — यह सत्य है, यह अस्तित्व है, यह शुभ है, यह श्रेष्ठ है। जब हम कहते हैं "सत्कर्म" या "सत्पुरुष" या "सत्संग" — तो इन सबमें "सत्" शब्द शुभता और सत्यता का बोध कराता है।
भगवान यहाँ बता रहे हैं कि "सत्" शब्द जीवन के हर अच्छे पक्ष को व्यक्त करता है — चाहे वह सच्चाई का भाव हो, अच्छाई का भाव हो, या किसी शुभ कर्म की प्रशंसा हो।