📿 श्लोक संग्रह

यज्ञे तपसि दाने च

गीता 17.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥
यज्ञे
यज्ञ में
तपसि
तप में
दाने
दान में
स्थितिः
स्थिरता / निष्ठा
सत्
सत् (शुभ)
इति
ऐसा
उच्यते
कहा जाता है
कर्म
कर्म
तदर्थीयम्
उसके (ब्रह्म के) लिए किया गया
अभिधीयते
कहा जाता है

भगवान कृष्ण कहते हैं कि यज्ञ, तप और दान में जो दृढ़ निष्ठा होती है, उसे भी "सत्" कहते हैं। और जो कर्म उस परम तत्व (ब्रह्म) के निमित्त किया जाता है, उसे भी "सत्" ही कहा जाता है।

इसका सुंदर अर्थ यह है कि "सत्" शब्द दो चीज़ों को व्यक्त करता है — पहला, शुभ कर्मों में स्थिर रहने का भाव; दूसरा, कर्म को ईश्वर के लिए करने का भाव। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में अडिग रहता है और सब कुछ ब्रह्म को अर्पित करता है — उसके कर्म "सत्" हैं।

जैसे एक दीपक लगातार जलता रहता है, बिना डगमगाए — वैसे ही शुभ कर्मों में स्थिर रहना "सत्" है। यह निष्ठा ही जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है।

श्लोक 17.26 और 17.27 मिलकर "सत्" शब्द की पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। इसके साथ "ॐ तत् सत्" की तीनों शब्दों की व्याख्या पूरी हो जाती है।

अगला श्लोक (17.28) अध्याय का अंतिम श्लोक है, जिसमें भगवान श्रद्धा-रहित कर्म की निंदा करके अध्याय का उपसंहार करते हैं।

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