📿 श्लोक संग्रह

सद्भावे साधुभावे च

गीता 17.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥
सद्भावे
सत्य-भाव में
साधुभावे
श्रेष्ठ भाव में
सत्
सत् शब्द
इति
ऐसा
एतत्
यह
प्रयुज्यते
प्रयोग किया जाता है
प्रशस्ते
प्रशंसनीय
कर्मणि
कर्म में
सच्छब्दः
"सत्" शब्द
पार्थ
हे अर्जुन

भगवान कृष्ण कहते हैं कि "सत्" शब्द का प्रयोग सत्य-भाव और श्रेष्ठ भाव — दोनों अर्थों में किया जाता है। इसी प्रकार, किसी प्रशंसनीय कर्म के लिए भी "सत्" शब्द का प्रयोग होता है।

"सत्" का अर्थ बहुत व्यापक है — यह सत्य है, यह अस्तित्व है, यह शुभ है, यह श्रेष्ठ है। जब हम कहते हैं "सत्कर्म" या "सत्पुरुष" या "सत्संग" — तो इन सबमें "सत्" शब्द शुभता और सत्यता का बोध कराता है।

भगवान यहाँ बता रहे हैं कि "सत्" शब्द जीवन के हर अच्छे पक्ष को व्यक्त करता है — चाहे वह सच्चाई का भाव हो, अच्छाई का भाव हो, या किसी शुभ कर्म की प्रशंसा हो।

यह श्लोक और अगला श्लोक (17.27) मिलकर "सत्" शब्द की व्याख्या करते हैं। 17.26 में "सत्" का सामान्य अर्थ बताया गया है, और 17.27 में उसका यज्ञ-तप-दान से संबंध।

"सत्" शब्द भारतीय संस्कृति का मूलभूत शब्द है — सत्य, सत्संग, सत्कार, सज्जन — सब इसी से बने हैं।

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