भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो दान बदले में कुछ पाने की आशा से, या किसी फल की लालसा से, या फिर अनिच्छा और कष्ट के साथ दिया जाता है — वह राजसिक दान है।
राजसिक दान में तीन दोष होते हैं — प्रत्युपकार की आशा (कि यह व्यक्ति भविष्य में मेरा कोई काम करेगा), फल की इच्छा (कि इस दान से मुझे पुण्य या स्वर्ग मिलेगा), और अनिच्छा (कि देना तो पड़ रहा है, लेकिन मन नहीं है)।
"परिक्लिष्ट" शब्द बहुत सटीक है — जब कोई व्यक्ति दान देते समय मन ही मन कष्ट अनुभव करता है, या देने के बाद पछताता है, तो वह राजसिक दान है। सच्चा दान वही है जो सहज भाव से, बिना किसी अपेक्षा के दिया जाए।