📿 श्लोक संग्रह

मूढग्राहेणात्मनो यत्

गीता 17.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥
मूढग्राहेण
मूर्खतापूर्ण हठ से
आत्मनः
अपने आप को
पीडया
पीड़ा देकर
क्रियते
किया जाता है
तपः
तप
परस्य
दूसरे के
उत्सादनार्थम्
विनाश के लिए
वा
अथवा
तामसम्
तामसिक

भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो तपस्या मूर्खतापूर्ण हठ से, अपने शरीर को कष्ट देकर, या दूसरों के विनाश के उद्देश्य से की जाती है — वह तामसिक तप है।

तामसिक तप में दो दोष हैं — पहला, व्यक्ति बिना समझ-बूझ के, केवल हठ के कारण अपने शरीर को अत्यधिक कष्ट देता है। दूसरा, कभी-कभी कोई व्यक्ति तपस्या इसलिए करता है कि उससे किसी शत्रु का अनिष्ट हो — यह और भी निंदनीय है।

इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ राक्षसों ने घोर तपस्या की, लेकिन उनका उद्देश्य लोककल्याण नहीं, बल्कि शक्ति प्राप्त करके दूसरों पर अत्याचार करना था। ऐसी तपस्या तामसिक है।

यह श्लोक तप-विभाग का तीसरा और अंतिम भाग है। श्लोक 17.17 (सात्त्विक), 17.18 (राजसिक) और 17.19 (तामसिक) — तीनों मिलकर तप का संपूर्ण गुणात्मक वर्गीकरण प्रस्तुत करते हैं।

अगले श्लोक से भगवान दान के त्रिगुणात्मक विभाजन की ओर मुड़ते हैं।

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