भगवान कृष्ण अब तपस्या के तीन प्रकार बताते हैं — शारीरिक, वाचिक और मानसिक। यह श्लोक शारीरिक तप का वर्णन करता है।
शारीरिक तप में शामिल हैं — देवताओं, विद्वानों, गुरुओं और ज्ञानी पुरुषों की सेवा-पूजा करना; शरीर और मन की पवित्रता रखना; व्यवहार में सरलता और सीधापन; ब्रह्मचर्य का पालन; और किसी भी प्राणी को कष्ट न देना।
यह तपस्या कठिन नहीं है — बड़ों का सम्मान करना, साफ़-सुथरा रहना, सच्चा और सरल आचरण करना, संयम रखना और किसी को दुख न देना — ये सब शारीरिक तप हैं। हमारी दादी-नानी जो नित्य पूजा करती हैं, घर को पवित्र रखती हैं, सबकी सेवा करती हैं — वे बिना जाने शारीरिक तप ही कर रही हैं।