📿 श्लोक संग्रह

एतां दृष्टिमवष्टभ्य

गीता 16.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
एताम्
इस
दृष्टिम्
दृष्टि (विचारधारा)
अवष्टभ्य
आश्रय लेकर
नष्टात्मानः
जिनकी आत्मा नष्ट हो चुकी
अल्पबुद्धयः
अल्प बुद्धि वाले
प्रभवन्ति
उत्पन्न होते हैं
उग्रकर्माणः
क्रूर कर्म करने वाले
क्षयाय
विनाश के लिए
जगतः
संसार के
अहिताः
अहित करने वाले

पिछले श्लोक में बताई गई आसुरी विचारधारा को अपनाकर ये लोग क्या करते हैं? भगवान कहते हैं — वे अपनी आत्मा खो बैठते हैं, उनकी बुद्धि बहुत संकीर्ण हो जाती है।

ऐसे लोग क्रूर कर्म करने वाले बनते हैं — दूसरों को सताना, शोषण करना, हिंसा करना। और इन सब कर्मों का परिणाम क्या होता है? संसार का विनाश।

"नष्टात्मानः" बहुत गहरा शब्द है — इसका मतलब है कि इन लोगों ने अपनी असली पहचान (आत्मा) खो दी है। जब कोई यह भूल जाता है कि वह आत्मा है, तो वह कुछ भी कर सकता है।

यह श्लोक गलत विचारधारा के व्यावहारिक परिणाम बताता है। जब कोई मानता है कि न ईश्वर है, न कोई नैतिक व्यवस्था — तो वह "उग्रकर्मा" (क्रूर कर्म करने वाला) बन जाता है।

"क्षयाय जगतः" — ये लोग न केवल अपना, बल्कि पूरे संसार का अहित करते हैं। यह चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

अध्याय 16 · 9 / 24
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