📿 श्लोक संग्रह

अहिंसा सत्यमक्रोधः

गीता 16.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
अहिंसा
किसी को कष्ट न देना
सत्यम्
सत्य बोलना
अक्रोधः
क्रोध न करना
त्यागः
त्याग
शान्तिः
मन की शान्ति
अपैशुनम्
चुगली न करना
दया
सब प्राणियों पर दया
भूतेषु
प्राणियों में
अलोलुप्त्वम्
लोभ का अभाव
मार्दवम्
कोमलता
ह्रीः
लज्जा (बुरे काम से)
अचापलम्
चंचलता का अभाव

पहले श्लोक के बाद भगवान दैवी गुणों की सूची आगे बढ़ाते हैं। अहिंसा — मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना। सत्य — जो बात जैसी हो, वैसी ही कहना, लेकिन प्रिय और हितकारी ढंग से।

अक्रोध का मतलब है कि भड़काने पर भी क्रोध न आए। त्याग — फल की इच्छा छोड़कर कर्म करना। शान्ति — मन का स्थिर और प्रसन्न रहना। अपैशुनम् — किसी की पीठ पीछे बुराई न करना।

दया सब प्राणियों के लिए — चाहे वे मनुष्य हों या पशु-पक्षी। अलोलुप्त्व — इन्द्रियों के विषय सामने आने पर भी लोभ न करना। मार्दव — व्यवहार में कोमलता। ह्री — बुरा काम करने में लज्जा अनुभव करना। अचापलम् — व्यर्थ की उछल-कूद न करना।

यह श्लोक 16.1 की सूची को आगे बढ़ाता है। पहले श्लोक में छह गुण थे, इसमें और गुण जोड़े गए हैं। तीनों श्लोकों (16.1-3) को मिलाकर दैवी सम्पदा के कुल छब्बीस गुण बताए गए हैं।

"ह्री" (लज्जा) को विशेष गुण माना गया है — जो व्यक्ति बुरा काम करते समय लज्जा अनुभव करता है, वह स्वयं ही बुराई से दूर हो जाता है।

अध्याय 16 · 2 / 24
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