पहले श्लोक के बाद भगवान दैवी गुणों की सूची आगे बढ़ाते हैं। अहिंसा — मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना। सत्य — जो बात जैसी हो, वैसी ही कहना, लेकिन प्रिय और हितकारी ढंग से।
अक्रोध का मतलब है कि भड़काने पर भी क्रोध न आए। त्याग — फल की इच्छा छोड़कर कर्म करना। शान्ति — मन का स्थिर और प्रसन्न रहना। अपैशुनम् — किसी की पीठ पीछे बुराई न करना।
दया सब प्राणियों के लिए — चाहे वे मनुष्य हों या पशु-पक्षी। अलोलुप्त्व — इन्द्रियों के विषय सामने आने पर भी लोभ न करना। मार्दव — व्यवहार में कोमलता। ह्री — बुरा काम करने में लज्जा अनुभव करना। अचापलम् — व्यर्थ की उछल-कूद न करना।