📿 श्लोक संग्रह

आत्मसम्भाविताः स्तब्धाः

गीता 16.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥
आत्मसम्भाविताः
अपने को बड़ा मानने वाले
स्तब्धाः
अकड़ वाले
धनमानमदान्विताः
धन और मान के मद से युक्त
यजन्ते
यज्ञ करते हैं
नामयज्ञैः
केवल नाम के यज्ञों से
ते
वे
दम्भेन
दम्भ (दिखावे) से
अविधिपूर्वकम्
शास्त्र-विधि के बिना

ये लोग अपने आप को बहुत बड़ा समझते हैं — "आत्मसम्भाविताः"। इनमें ऐसी अकड़ होती है कि ये किसी के सामने झुकते नहीं। धन का घमंड, मान का नशा — इन दोनों से ये भरे रहते हैं।

ये यज्ञ भी करते हैं — पर केवल नाम के लिए। दिखावे के लिए बड़े-बड़े अनुष्ठान करते हैं, पर उनमें न सही विधि होती है, न सच्ची श्रद्धा। बस लोगों को दिखाना है कि "देखो, मैं कितना धार्मिक हूँ।"

"अविधिपूर्वकम्" — शास्त्र की विधि के बिना। यह बताता है कि इनके धार्मिक कर्म भी खोखले हैं — बाहर से सुन्दर, भीतर से खाली।

यह श्लोक "दम्भ" (पाखंड) के व्यावहारिक उदाहरण को बताता है। धार्मिक आडम्बर — बड़े-बड़े अनुष्ठान जो केवल दिखावे के लिए हों — यह आसुरी सम्पदा का एक प्रमुख लक्षण है।

गीता 17.11-13 में भी यज्ञ के तीन प्रकार बताए गए हैं — सात्विक, राजसिक और तामसिक। यहाँ वर्णित दम्भ-यज्ञ तामसिक श्रेणी में आता है।

अध्याय 16 · 17 / 24
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