ये लोग अपने आप को बहुत बड़ा समझते हैं — "आत्मसम्भाविताः"। इनमें ऐसी अकड़ होती है कि ये किसी के सामने झुकते नहीं। धन का घमंड, मान का नशा — इन दोनों से ये भरे रहते हैं।
ये यज्ञ भी करते हैं — पर केवल नाम के लिए। दिखावे के लिए बड़े-बड़े अनुष्ठान करते हैं, पर उनमें न सही विधि होती है, न सच्ची श्रद्धा। बस लोगों को दिखाना है कि "देखो, मैं कितना धार्मिक हूँ।"
"अविधिपूर्वकम्" — शास्त्र की विधि के बिना। यह बताता है कि इनके धार्मिक कर्म भी खोखले हैं — बाहर से सुन्दर, भीतर से खाली।