📿 श्लोक संग्रह

अनेकचित्तविभ्रान्ता

गीता 16.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥
अनेकचित्तविभ्रान्ताः
अनेक विचारों से भ्रमित
मोहजालसमावृताः
मोह के जाल में फँसे
प्रसक्ताः
आसक्त
कामभोगेषु
भोगों में
पतन्ति
गिरते हैं
नरके
नरक में
अशुचौ
अपवित्र

भगवान अब आसुरी लोगों का परिणाम बताते हैं। ये लोग अनेक प्रकार के विचारों से भ्रमित रहते हैं — मन कभी इधर भागता है, कभी उधर। एक निश्चय नहीं, एक दिशा नहीं — बस भटकते रहते हैं।

"मोहजालसमावृताः" — ये मोह के जाल में इस तरह लिपटे हुए हैं जैसे मछली जाल में फँस जाती है। जितना छटपटाएँ, उतना और फँसते जाएँ।

भोगों में आसक्त ये लोग अंततः अपवित्र नरक में गिरते हैं। यहाँ "नरक" का अर्थ केवल मरने के बाद का नहीं — जीते-जी भी दुख, अशांति और पतन का अनुभव नरक ही है।

यह श्लोक आसुरी मन के आत्म-संवाद (श्लोक 13-15) का निष्कर्ष है। वह सारा अहंकार, वह सारी इच्छाएँ — सबका अंत "नरक" में होता है। भगवान यहाँ स्पष्ट चेतावनी दे रहे हैं।

"अनेकचित्तविभ्रान्ता" — यह शब्द मन की बिखरी हुई अवस्था का बहुत सटीक वर्णन है। जब मन एकाग्र नहीं, तो व्यक्ति न सुखी हो सकता है, न सफल।

अध्याय 16 · 16 / 24
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