📿 श्लोक संग्रह

आढ्योऽभिजनवानस्मि

गीता 16.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
आढ्यः
धनी
अभिजनवान्
कुलीन (बड़े कुल का)
अस्मि
मैं हूँ
कः अन्यः अस्ति
और कौन है
सदृशः मया
मेरे बराबर
यक्ष्ये
यज्ञ करूँगा
दास्यामि
दान दूँगा
मोदिष्ये
आनंद मनाऊँगा
इति
ऐसा (सोचते हैं)
अज्ञानविमोहिताः
अज्ञान से मोहित

आसुरी मन का प्रलाप जारी है: "मैं धनी हूँ, बड़े कुल का हूँ। मेरे बराबर कौन है?" — यह धन और वंश का घमंड है। ऐसे लोग सोचते हैं कि धन और कुल ही सब कुछ है।

फिर ये कहते हैं — "मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, और मौज मनाऊँगा।" पर यहाँ यज्ञ और दान भी दिखावे के लिए है — दूसरों को प्रभावित करने के लिए, न कि भगवान की सेवा या जरूरतमंदों की मदद के लिए।

भगवान अंत में कहते हैं — ये सब "अज्ञानविमोहिताः" हैं — अज्ञान के कारण मोह में पड़े हुए। इन्हें पता ही नहीं कि सच्चा सुख कहाँ है। ये बाहरी दिखावे में लगे हैं, भीतर का सच देख नहीं पाते।

यह श्लोक दिखाता है कि आसुरी व्यक्ति धार्मिक कर्म (यज्ञ, दान) भी अहंकार से करता है। बाहर से वह धार्मिक दिख सकता है, पर भीतर का भाव दिखावे का है — यही "दम्भ" है जो श्लोक 16.4 में बताया गया था।

अध्याय 16 · 15 / 24
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