आसुरी मन का प्रलाप जारी है: "मैं धनी हूँ, बड़े कुल का हूँ। मेरे बराबर कौन है?" — यह धन और वंश का घमंड है। ऐसे लोग सोचते हैं कि धन और कुल ही सब कुछ है।
फिर ये कहते हैं — "मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, और मौज मनाऊँगा।" पर यहाँ यज्ञ और दान भी दिखावे के लिए है — दूसरों को प्रभावित करने के लिए, न कि भगवान की सेवा या जरूरतमंदों की मदद के लिए।
भगवान अंत में कहते हैं — ये सब "अज्ञानविमोहिताः" हैं — अज्ञान के कारण मोह में पड़े हुए। इन्हें पता ही नहीं कि सच्चा सुख कहाँ है। ये बाहरी दिखावे में लगे हैं, भीतर का सच देख नहीं पाते।