📿 श्लोक संग्रह

असौ मया हतः शत्रुः

गीता 16.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
असौ
वह
मया
मैंने
हतः
मार दिया
शत्रुः
शत्रु को
हनिष्ये
मारूँगा
अपरान् अपि
दूसरों को भी
ईश्वरः अहम्
मैं ईश्वर हूँ
भोगी
भोगने वाला
सिद्धः अहम्
मैं सिद्ध हूँ
बलवान्
बलवान
सुखी
सुखी

आसुरी मन का आत्म-संवाद और आगे बढ़ता है: "उस शत्रु को तो मैंने मार गिराया, अब बाकी दुश्मनों को भी मार दूँगा।" — यह हिंसा और प्रतिशोध की मानसिकता है।

फिर अहंकार की चरम सीमा: "मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं सुखी हूँ।" — हर वाक्य में "अहम्" (मैं) है। यह व्यक्ति खुद को ही भगवान मानता है।

ध्यान दीजिए — "सुखी" अंत में आता है। ऐसा व्यक्ति खुद को सुखी "मानता" है, पर वास्तव में सुखी नहीं है। अगले श्लोकों में इसी बात की पुष्टि होती है।

"ईश्वरोऽहम्" (मैं ईश्वर हूँ) — यह आसुरी अहंकार का चरम बिन्दु है। वेदान्त में "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) आत्मज्ञान है, पर यहाँ "ईश्वरोऽहम्" अहंकार से कहा जा रहा है — दोनों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है।

अध्याय 16 · 14 / 24
← पिछला अध्याय 16 · 14 / 24 अगला →