📿 श्लोक संग्रह

इदमद्य मया लब्धम्

गीता 16.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥
इदम्
यह
अद्य
आज
मया
मैंने
लब्धम्
पाया
इमम्
इस
प्राप्स्ये
प्राप्त करूँगा
मनोरथम्
मनोरथ (इच्छा)
इदम् अस्ति
यह है (मेरे पास)
इदम् अपि
यह भी
मे भविष्यति
मेरा होगा
पुनः धनम्
और धन

अब भगवान आसुरी व्यक्ति की भीतरी सोच को उसी के शब्दों में बताते हैं। यह आसुरी मन का आत्म-संवाद है: "आज मैंने यह पा लिया, कल वह भी मिल जाएगा। इतना तो मेरे पास है ही, और भी धन आएगा।"

ध्यान दीजिए — हर वाक्य में "मैं" और "मेरा" है। यह अहंकार की पराकाष्ठा है। ऐसा व्यक्ति सोचता है कि सब कुछ उसी के प्रयत्न से मिला है — भगवान की कृपा, दूसरों का सहयोग, परिस्थितियों का योगदान — इन सबको वह नज़रअंदाज़ करता है।

यह सोच एक जाल है — जितना मिलता है, उतनी और भूख बढ़ती है। "पुनर्धनम्" — और धन, और धन — यह "और" कभी ख़त्म नहीं होता।

श्लोक 16.13 से 16.16 तक आसुरी मन के विचारों को सीधे उद्धृत किया गया है। यह गीता की एक अनोखी शैली है — भगवान आसुरी व्यक्ति के मन में झाँककर उसकी सोच हमें दिखा रहे हैं।

यह आत्म-परीक्षा का अवसर है — क्या हमारे मन में भी कभी-कभी ऐसे विचार नहीं आते?

अध्याय 16 · 13 / 24
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