अब भगवान आसुरी व्यक्ति की भीतरी सोच को उसी के शब्दों में बताते हैं। यह आसुरी मन का आत्म-संवाद है: "आज मैंने यह पा लिया, कल वह भी मिल जाएगा। इतना तो मेरे पास है ही, और भी धन आएगा।"
ध्यान दीजिए — हर वाक्य में "मैं" और "मेरा" है। यह अहंकार की पराकाष्ठा है। ऐसा व्यक्ति सोचता है कि सब कुछ उसी के प्रयत्न से मिला है — भगवान की कृपा, दूसरों का सहयोग, परिस्थितियों का योगदान — इन सबको वह नज़रअंदाज़ करता है।
यह सोच एक जाल है — जितना मिलता है, उतनी और भूख बढ़ती है। "पुनर्धनम्" — और धन, और धन — यह "और" कभी ख़त्म नहीं होता।