यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। 'ममैवांशः' — मेरा ही अंश। श्रीकृष्ण कह रहे हैं — इस संसार में जो भी जीव है, वह मेरा ही एक टुकड़ा है। जैसे एक दीपक से हज़ार दीपक जलाए जाएँ — हर दीपक की लौ उसी एक लौ का अंश है।
यह अंश सनातन है — न पहले नहीं था, न आगे नहीं रहेगा। बस शरीर आते-जाते हैं। यह जीव-अंश मन सहित पाँच इंद्रियों — आँख, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा — को अपनी ओर खींचता है, यानी इनके माध्यम से संसार से जुड़ता है।
दादी बच्चे को समझाती हैं — 'बेटा, तू ईश्वर का अंश है।' यह श्लोक उसी बात का मूल है। हर जीव में वही परमात्मा है जो 15.6 में 'परम धाम' के रूप में वर्णित हुआ।