📿 श्लोक संग्रह

ममैवांशो जीवलोके

गीता 15.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
मम एव अंशः
मेरा ही अंश
जीवलोके
जीव-लोक में (इस संसार में)
जीवभूतः
जीव बनकर
सनातनः
सनातन (अनादि-अनंत)
मनःषष्ठानि
मन सहित छह
इन्द्रियाणि
इंद्रियाँ
प्रकृतिस्थानि
प्रकृति में स्थित
कर्षति
आकर्षित करता है (खींचता है)

यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। 'ममैवांशः' — मेरा ही अंश। श्रीकृष्ण कह रहे हैं — इस संसार में जो भी जीव है, वह मेरा ही एक टुकड़ा है। जैसे एक दीपक से हज़ार दीपक जलाए जाएँ — हर दीपक की लौ उसी एक लौ का अंश है।

यह अंश सनातन है — न पहले नहीं था, न आगे नहीं रहेगा। बस शरीर आते-जाते हैं। यह जीव-अंश मन सहित पाँच इंद्रियों — आँख, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा — को अपनी ओर खींचता है, यानी इनके माध्यम से संसार से जुड़ता है।

दादी बच्चे को समझाती हैं — 'बेटा, तू ईश्वर का अंश है।' यह श्लोक उसी बात का मूल है। हर जीव में वही परमात्मा है जो 15.6 में 'परम धाम' के रूप में वर्णित हुआ।

यह श्लोक अध्याय 15 में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। 15.1-6 तक संसार-वृक्ष और परम धाम का वर्णन था। 15.7 से श्रीकृष्ण जीव और ईश्वर के संबंध की बात करते हैं। 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' — यह अर्धश्लोक परंपरा में आत्मा की ईश्वर-अंशता का सबसे संक्षिप्त प्रमाण माना जाता है।

परंपरा में यह श्लोक विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसे अनेक भक्त-संत परंपराओं में जीव-ब्रह्म संबंध की व्याख्या के आधार के रूप में उद्धृत किया जाता रहा है।

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