📿 श्लोक संग्रह

न तद्भासयते सूर्यः

गीता 15.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
न तद् भासयते
उसे प्रकाशित नहीं करता
सूर्यः
सूर्य
न शशाङ्कः
न चंद्रमा
न पावकः
न अग्नि
यद् गत्वा
जहाँ जाने पर
न निवर्तन्ते
वापस नहीं लौटते
तत्
वह
धाम परमम् मम
मेरा परम धाम है

यह श्लोक परम धाम का एक अनोखा वर्णन है। हम जो कुछ देखते हैं — सूर्य का उजाला, चंद्रमा की चाँदनी, दीपक की लौ — यह सब उस परम स्थान को प्रकाशित नहीं कर सकते। वह स्थान स्वयं प्रकाशमान है।

जैसे दिन में सूर्य की रोशनी से आँख चौंधिया जाती है लेकिन सूरज खुद आँखों से देखा नहीं जाता — उस परम धाम की भी ऐसी ही बात है। वह भीतर का प्रकाश है, बाहरी रोशनी से परे।

और वहाँ जाने के बाद वापसी नहीं। यही उस स्थान की पहचान है। श्रीकृष्ण इसे 'मेरा परम धाम' कहते हैं — यह उनकी अपनी उपस्थिति का स्थान है।

यह श्लोक 15.5 के बाद परम पद का वर्णन करता है। 'सूर्य-चंद्र-अग्नि नहीं चमकते' — यह उपमा मुण्डकोपनिषद् (2.2.10) और श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी मिलती है।

परंपरा में यह श्लोक परम धाम की अवर्णनीयता का प्रमाण-पद माना जाता रहा है। 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' — यह वाक्यांश 15.4 के 'न निवर्तन्ति भूयः' का पूरक है।

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