पूरा पुरुषोत्तमयोग यहाँ समाप्त होता है। श्रीकृष्ण इसे 'गुह्यतम शास्त्र' कहते हैं — सबसे गोपनीय। जो बात सब जगह नहीं कही जाती, जो जानने के लिए भीतर की तैयारी चाहिए — वह यह है।
अर्जुन को 'अनघ' — निष्पाप — कहा। यह शिष्य के प्रति गुरु का प्रेम है। कहने का भाव यह है — तू इस बात को पाने के योग्य है।
कृतकृत्य — जिसने जो करना था वह कर लिया। जब यह ज्ञान समझ में आ जाए तो और कुछ पाना शेष नहीं। जैसे यात्री घर पहुँच जाए — यात्रा पूरी हुई।