📿 श्लोक संग्रह

इति गुह्यतमं शास्त्रम्

गीता 15.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥
इति
इस प्रकार
गुह्यतमम् शास्त्रम्
यह सबसे गोपनीय शास्त्र
इदम् उक्तम् मया
यह मैंने कहा
अनघ
हे निष्पाप (अर्जुन)
एतद् बुद्ध्वा
इसे समझकर
बुद्धिमान् स्यात्
बुद्धिमान होता है
कृतकृत्यः च
और कृतकृत्य (जिसने सब कर लिया)
भारत
हे भरतवंशी (अर्जुन)

पूरा पुरुषोत्तमयोग यहाँ समाप्त होता है। श्रीकृष्ण इसे 'गुह्यतम शास्त्र' कहते हैं — सबसे गोपनीय। जो बात सब जगह नहीं कही जाती, जो जानने के लिए भीतर की तैयारी चाहिए — वह यह है।

अर्जुन को 'अनघ' — निष्पाप — कहा। यह शिष्य के प्रति गुरु का प्रेम है। कहने का भाव यह है — तू इस बात को पाने के योग्य है।

कृतकृत्य — जिसने जो करना था वह कर लिया। जब यह ज्ञान समझ में आ जाए तो और कुछ पाना शेष नहीं। जैसे यात्री घर पहुँच जाए — यात्रा पूरी हुई।

यह अध्याय 15 का अंतिम श्लोक है। 'गुह्यतमम्' — यह शब्द गीता में गीता के अन्य अध्यायों के उपसंहार में भी आता है (जैसे 18.63-64 में 'गुह्याद्गुह्यतरम्')। यह अध्याय का विशेष महत्व दर्शाता है।

परंपरा में पुरुषोत्तमयोग को गीता का सार माना जाता रहा है। 'कृतकृत्यः' — यह पद मुक्ति की अवस्था का सांकेतिक शब्द है — जिसका कर्तव्य पूर्ण हुआ।

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