यह श्लोक पूरे अध्याय 15 का हृदय है। 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' — मैं सबके हृदय में हूँ। हर मनुष्य में, हर प्राणी में। और वहाँ से — स्मृति देता हूँ, ज्ञान देता हूँ, और कभी-कभी भुलाता भी हूँ।
यह भूलाना भी उन्हीं का काम है — जैसे एक बुज़ुर्ग कहते हैं 'जो जाना हो जाने दो।' जो पुरानी बात मन में अटकी हो और आगे बढ़ने में बाधा डाले — उसे हटाने की शक्ति भी उन्हीं से है।
वेद क्या खोजते हैं? उन्हीं को। वेदांत किसने बनाया? उन्होंने। वेदों को सच में कौन जानता है? वे ही। यह श्लोक एक वृत्त पूरा करता है।