15.10 में कहा था — ज्ञानचक्षु वाले देखते हैं। अब 15.11 में बताया जा रहा है कि देखना यत्न से होता है। योगी — जो भीतर की ओर मुड़े हैं — वे इस जीव-तत्व को आत्मा में देखते हैं।
लेकिन एक और बात है — 'अकृतात्मा'। यत्न तो वे भी करते हैं। लेकिन उनकी आत्मा अभी कच्ची है — जैसे कच्ची मिट्टी से बना घड़ा पानी नहीं रोक सकता। यत्न काफ़ी नहीं, भीतर की परिपक्वता चाहिए।
यह कठोर बात नहीं है — यह एक वास्तविकता है। जो बीज अभी अंकुरित नहीं हुआ, वह फूल नहीं दे सकता। पर बीज में संभावना है — और यत्न उस संभावना को जगाता है।