📿 श्लोक संग्रह

सत्त्वं सुखे सञ्जयति

गीता 14.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥
सत्त्वम्
सत्त्वगुण
सुखे
सुख में
सञ्जयति
लगा देता है
रजः
रजोगुण
कर्मणि
कर्म में
भारत
हे भरतवंशी
ज्ञानम्
ज्ञान को
आवृत्य
ढँककर
तु
परन्तु
तमः
तमोगुण
प्रमादे
प्रमाद/लापरवाही में

भगवान कहते हैं — हे भरतवंशी, सत्त्वगुण मनुष्य को सुख में आसक्त करता है, रजोगुण कर्म में लगाता है, और तमोगुण ज्ञान को ढँककर प्रमाद (लापरवाही) में लगा देता है।

यह एक सारांश श्लोक है — तीनों गुणों का सार एक ही जगह बता दिया। सत्त्व = सुख की ओर खींचता है। रजस् = काम-धंधे की ओर खींचता है। तमस् = ज्ञान पर पर्दा डालकर भूल-चूक की ओर ले जाता है।

दैनिक जीवन में हम इसे आसानी से देख सकते हैं — सुबह जब मन शांत होता है, वह सत्त्व है; दिन में जब काम की भागदौड़ होती है, वह रजस् है; और शाम को जब थकान आती है और मन सुस्त हो जाता है, वह तमस् है।

यह श्लोक तीनों गुणों के प्रभाव का सुंदर सारांश है। पहले तीन श्लोकों (14.6-8) में एक-एक गुण का विस्तृत वर्णन था, यहाँ तीनों को एक साथ रखकर तुलना की गई है।

अगले श्लोक (14.10) में भगवान बताएँगे कि ये तीन गुण आपस में कैसे प्रतिस्पर्धा करते हैं।

अध्याय 14 · 9 / 27
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