भगवान कहते हैं — हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण को राग-स्वरूप जानो। यह तृष्णा (कुछ पाने की लालसा) और आसक्ति (किसी चीज से चिपकने की भावना) से पैदा होता है। यह जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बाँध देता है।
इसे ऐसे समझो — जब मन में "मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए" की भावना बार-बार उठती है, तो यह रजोगुण है। जो व्यक्ति हमेशा भागदौड़ में रहता है, नई-नई चीजें पाना चाहता है, कभी शांत नहीं बैठ पाता — उसमें रजोगुण प्रबल है।
रजोगुण बुरा नहीं है — यह कर्म करने की प्रेरणा देता है। पर जब यह अत्यधिक हो जाए तो व्यक्ति बेचैन रहता है, कभी संतुष्ट नहीं होता।