📿 श्लोक संग्रह

रजो रागात्मकं विद्धि

गीता 14.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥
रजः
रजोगुण
रागात्मकम्
राग-स्वरूप
विद्धि
जानो
तृष्णा
तृष्णा/लालसा
सङ्ग
आसक्ति
समुद्भवम्
से उत्पन्न
तत्
वह
निबध्नाति
बाँधता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
कर्मसङ्गेन
कर्म की आसक्ति से
देहिनम्
जीवात्मा को

भगवान कहते हैं — हे कुन्तीपुत्र, रजोगुण को राग-स्वरूप जानो। यह तृष्णा (कुछ पाने की लालसा) और आसक्ति (किसी चीज से चिपकने की भावना) से पैदा होता है। यह जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बाँध देता है।

इसे ऐसे समझो — जब मन में "मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए" की भावना बार-बार उठती है, तो यह रजोगुण है। जो व्यक्ति हमेशा भागदौड़ में रहता है, नई-नई चीजें पाना चाहता है, कभी शांत नहीं बैठ पाता — उसमें रजोगुण प्रबल है।

रजोगुण बुरा नहीं है — यह कर्म करने की प्रेरणा देता है। पर जब यह अत्यधिक हो जाए तो व्यक्ति बेचैन रहता है, कभी संतुष्ट नहीं होता।

पिछले श्लोक में सत्त्वगुण का वर्णन था, अब रजोगुण का। ध्यान दीजिए — सत्त्व सुख-ज्ञान से बाँधता है, रजस् कर्म से बाँधता है। अगले श्लोक में तमोगुण का वर्णन होगा।

अध्याय 14 · 7 / 27
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