भगवान कहते हैं — जो अनन्य भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पूर्णतः पार करके ब्रह्म-स्वरूप होने के योग्य हो जाता है।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक है। अर्जुन ने पूछा था "कैसे गुणों को पार करें?" — इसका उत्तर है: अनन्य भक्ति। "अव्यभिचारेण" का अर्थ है — बिना किसी विचलन के, एकनिष्ठ भाव से।
भगवान यहाँ भक्ति को गुणातीत होने का सबसे सरल और सुनिश्चित उपाय बता रहे हैं। ज्ञान कठिन हो सकता है, योग कठिन हो सकता है, पर भक्ति सबके लिए सुलभ है — बस एकनिष्ठ होनी चाहिए।