📿 श्लोक संग्रह

गुणानेतानतीत्य त्रीन्

गीता 14.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥
गुणान्
गुणों को
एतान्
इन
अतीत्य
पार करके
त्रीन्
तीन
देही
शरीरधारी (आत्मा)
देहसमुद्भवान्
शरीर से उत्पन्न
जन्म
जन्म
मृत्यु
मृत्यु
जरा
बुढ़ापा
दुःखैः
दुःखों से
विमुक्तः
मुक्त होकर
अमृतम्
अमृत (मोक्ष)
अश्नुते
प्राप्त करता है

भगवान कहते हैं — जो शरीरधारी इन तीनों गुणों को — जो शरीर के कारण उत्पन्न होते हैं — पार कर जाता है, वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःख से मुक्त होकर अमृत (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

यह अध्याय का सबसे आशापूर्ण श्लोक है। भगवान कह रहे हैं कि गुणों से बँधा होना हमारी नियति नहीं है — हम इनसे पार जा सकते हैं। और जब पार जाते हैं, तो जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है।

"देहसमुद्भवान्" बताता है कि ये गुण शरीर से संबंधित हैं, आत्मा से नहीं। आत्मा स्वयं गुणातीत है — बस अज्ञान के कारण वह गुणों से बँधी प्रतीत होती है।

इस श्लोक को सुनकर अर्जुन के मन में प्रश्न उठता है — गुणातीत पुरुष की पहचान क्या है? वह कैसे व्यवहार करता है? यही प्रश्न अगले श्लोक (14.21) में अर्जुन पूछते हैं।

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