भगवान कहते हैं — जब द्रष्टा (साक्षी भाव से देखने वाला) यह देख लेता है कि गुणों के सिवाय कोई और कर्ता नहीं है, और गुणों से भी परे जो तत्त्व है उसे जान लेता है — तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त करता है।
यह बहुत गहरी बात है। जब हम कहते हैं "मैंने यह किया" — तो वास्तव में वह प्रकृति के गुणों ने किया है। आत्मा तो साक्षी है — देखने वाला। जब यह ज्ञान दृढ़ हो जाए कि "मैं कर्ता नहीं, गुण ही गुणों में बरत रहे हैं" — तो यही गुणातीत अवस्था की शुरुआत है।
और जो गुणों से भी परे अपने असली स्वरूप (आत्मा/परमात्मा) को जान लेता है, वह भगवान को प्राप्त करता है।