📿 श्लोक संग्रह

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारम्

गीता 14.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
न अन्यम्
कोई दूसरा नहीं
गुणेभ्यः
गुणों के अतिरिक्त
कर्तारम्
कर्ता
यदा
जब
द्रष्टा
देखने वाला (साक्षी)
अनुपश्यति
देखता है
गुणेभ्यः
गुणों से
और
परम्
परे
वेत्ति
जानता है
मद्भावम्
मेरे स्वरूप को
सः अधिगच्छति
वह प्राप्त करता है

भगवान कहते हैं — जब द्रष्टा (साक्षी भाव से देखने वाला) यह देख लेता है कि गुणों के सिवाय कोई और कर्ता नहीं है, और गुणों से भी परे जो तत्त्व है उसे जान लेता है — तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त करता है।

यह बहुत गहरी बात है। जब हम कहते हैं "मैंने यह किया" — तो वास्तव में वह प्रकृति के गुणों ने किया है। आत्मा तो साक्षी है — देखने वाला। जब यह ज्ञान दृढ़ हो जाए कि "मैं कर्ता नहीं, गुण ही गुणों में बरत रहे हैं" — तो यही गुणातीत अवस्था की शुरुआत है।

और जो गुणों से भी परे अपने असली स्वरूप (आत्मा/परमात्मा) को जान लेता है, वह भगवान को प्राप्त करता है।

यह श्लोक अध्याय का मोड़ है। अब तक गुणों का वर्णन हो रहा था, अब गुणों से परे जाने का मार्ग बताया जा रहा है। यही बात गीता 3.28 में भी कही गई है — "गुणा गुणेषु वर्तन्ते"।

अगले श्लोक (14.20) में गुणातीत होने का फल बताया जाएगा।

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