📿 श्लोक संग्रह

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था

गीता 14.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥
ऊर्ध्वम्
ऊपर
गच्छन्ति
जाते हैं
सत्त्वस्थाः
सत्त्वगुण में स्थित
मध्ये
मध्य में
तिष्ठन्ति
रहते हैं
राजसाः
राजसी लोग
जघन्यगुणवृत्तिस्थाः
निम्न गुण (तमस्) में स्थित
अधः
नीचे
गच्छन्ति
जाते हैं
तामसाः
तामसी लोग

भगवान कहते हैं — सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (उत्तम लोकों में) जाते हैं, राजसी लोग मध्य में (मनुष्य लोक में) रहते हैं, और तामसी लोग नीचे (अधोगति को) जाते हैं।

इसे ऐसे समझो — जैसे पानी में भारी चीज डूब जाती है, हल्की चीज तैरती रहती है, और बीच की चीज बीच में रहती है — वैसे ही सत्त्व हल्का होने से ऊपर ले जाता है, तमस् भारी होने से नीचे खींचता है, और रजस् बीच में रखता है।

यह श्लोक स्पष्ट संदेश देता है — जीवन में सत्त्वगुण बढ़ाना श्रेयस्कर है।

यह श्लोक गुणों के फल का अंतिम सारांश है। अब अध्याय का विषय बदलता है — अगले श्लोक (14.19) से गुणातीत (गुणों से परे जाने) का विषय शुरू होता है, जो अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाग है।

अध्याय 14 · 18 / 27
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