📿 श्लोक संग्रह

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानम्

गीता 14.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥
सत्त्वात्
सत्त्वगुण से
सञ्जायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
रजसः
रजोगुण से
लोभः
लोभ
एव च
ही
प्रमाद
लापरवाही
मोहौ
और मोह
तमसः
तमोगुण से
भवतः
होते हैं
अज्ञानम्
अज्ञान

भगवान कहते हैं — सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है, और तमोगुण से प्रमाद (लापरवाही), मोह (भ्रम) और अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

यह बहुत स्पष्ट सारांश है। यदि आप अपने मन को देखें तो पता चल जाएगा कि कौन-सा गुण प्रबल है — क्या मन में स्पष्टता है (सत्त्व)? क्या लालसा है (रजस्)? या भ्रम और सुस्ती है (तमस्)?

जो व्यक्ति ज्ञान बढ़ाना चाहता है, उसे सत्त्वगुण बढ़ाना चाहिए — सात्त्विक आहार, सत्संग, अध्ययन और ध्यान से सत्त्व बढ़ता है।

यह श्लोक पिछले श्लोक (14.16) के कर्मफल-विभाजन को आगे बढ़ाता है। अब गुणों से उत्पन्न होने वाली मानसिक अवस्थाओं का वर्णन हुआ। अगले श्लोक (14.18) में गुणों के अनुसार गति (ऊर्ध्व, मध्य, अधो) बताई जाएगी।

अध्याय 14 · 17 / 27
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