📿 श्लोक संग्रह

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्

गीता 13.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रिय-विषयों में
वैराग्यम्
वैराग्य, आसक्ति न रखना
अनहंकारः
अहंकार का न होना
एव
ही
और
जन्म
जन्म में
मृत्यु
मृत्यु में
जरा
बुढ़ापे में
व्याधि
रोग में
दुःखदोषानुदर्शनम्
दुःख और दोष देखना

ज्ञान का अगला लक्षण है — इन्द्रिय-विषयों में आसक्ति न रखना। जो चीज़ें आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा को अच्छी लगती हैं — उनमें बंध न जाना। और अहंकार — 'मैं बड़ा हूँ, मैं जानता हूँ' — इस भाव का न होना।

साथ ही जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग में जो दुःख और दोष हैं, उन्हें देखते रहना — यह भी ज्ञान का लक्षण है। यह निराशा नहीं, यह सच्ची समझ है — कि संसार का जो रूप है, उसे जैसा है वैसा देखना।

यह नौवाँ श्लोक ज्ञान-लक्षण श्रृंखला का हिस्सा है। जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि का यह दर्शन बौद्ध परंपरा में भी मिलता है — यह मानव अनुभव की साझा सच्चाई है।

गीता प्रेस पाठ में यह नौवाँ श्लोक है। 'अनहंकार' — अहंकार का अभाव — इस पूरी सूची में सबसे केंद्रीय गुण है।

अध्याय 13 · 9 / 34
अध्याय 13 · 9 / 34 अगला →