📿 श्लोक संग्रह

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम्

गीता 13.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के
एवम्
इस प्रकार
अन्तरम्
अंतर को, भेद को
ज्ञानचक्षुषा
ज्ञान की आँख से
भूतप्रकृतिमोक्षम्
प्राणियों की प्रकृति से मुक्ति को
और
ये
जो
विदुः
जानते हैं
यान्ति
जाते हैं
ते
वे
परम्
परम को

यह तेरहवें अध्याय का अंतिम श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — जो ज्ञान की आँख से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को जानते हैं, और यह भी जानते हैं कि प्राणी प्रकृति से कैसे मुक्त हो सकते हैं — वे परम को प्राप्त होते हैं।

'ज्ञानचक्षुषा' — ज्ञान की आँख — यह पद बहुत सुंदर है। साधारण आँखें शरीर देखती हैं। ज्ञान की आँख आत्मा देखती है। जिसकी यह आँख खुल जाती है — वह परम को पाता है।

यह अध्याय 13 का समापन श्लोक है। पूरे अध्याय की यात्रा यहाँ परिणाम पर पहुँचती है — क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक से परम को पाना।

गीता प्रेस पाठ में यह चौंतीसवाँ और अंतिम श्लोक है। कुछ परंपराओं में यही 13.35 के रूप में गिना जाता है — संख्या परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है। इस पृष्ठ को needs_review के रूप में चिह्नित किया जा रहा है।

needs_review: गीता प्रेस (गोरखपुर) के 35-श्लोक-वाले संस्करण में अंतिम श्लोक इसी के रूप में आता है — जो कुछ परंपराओं में 13.34 है, वही दूसरों में 13.35 है। कृपया सत्यापित करें कि प्रयुक्त संस्करण में यह 13.34 है या 13.35।

अध्याय 13 · 34 / 34
अध्याय 13 · 34 / 34 अध्याय 14 →