जब कोई यह देख पाता है कि सब प्राणियों की यह जो विविधता है — इतने रंग, इतने रूप, इतनी जातियाँ — वे सब एक ही मूल में स्थित हैं। और उसी एक से फैली हुई हैं — तब वह ब्रह्म को पाता है।
जैसे एक महासागर है और उसमें असंख्य लहरें। लहरें अलग-अलग दिखती हैं — छोटी, बड़ी, शांत, तेज — पर सब जल हैं, सब एक ही सागर से हैं। यही दर्शन ब्रह्म-प्राप्ति है।