📿 श्लोक संग्रह

यदा भूतपृथग्भावम्

गीता 13.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
यदा
जब
भूतपृथग्भावम्
प्राणियों की विविध भिन्नता को
एकस्थम्
एक में स्थित
अनुपश्यति
देखता है
ततः
उसी से
एव
ही
और
विस्तारम्
फैलाव, प्रसार
ब्रह्म
ब्रह्म को
सम्पद्यते
प्राप्त होता है
तदा
तब

जब कोई यह देख पाता है कि सब प्राणियों की यह जो विविधता है — इतने रंग, इतने रूप, इतनी जातियाँ — वे सब एक ही मूल में स्थित हैं। और उसी एक से फैली हुई हैं — तब वह ब्रह्म को पाता है।

जैसे एक महासागर है और उसमें असंख्य लहरें। लहरें अलग-अलग दिखती हैं — छोटी, बड़ी, शांत, तेज — पर सब जल हैं, सब एक ही सागर से हैं। यही दर्शन ब्रह्म-प्राप्ति है।

यह श्लोक अद्वैत अनुभव की सबसे सरल और काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। विविधता में एकता देखना — यह केवल बौद्धिक समझ नहीं, एक अनुभव है जो साधना से आता है।

गीता प्रेस पाठ में यह तीसवाँ श्लोक है। इसके बाद तीन श्लोक आत्मा की प्रकृति — अविनाशी, अकर्ता, अलिप्त — पर प्रकाश डालते हैं।

अध्याय 13 · 30 / 34
अध्याय 13 · 30 / 34 अगला →