यह परमात्मा अनादि है — इसका कोई आरंभ नहीं। निर्गुण है — तीनों गुणों से परे है। अव्यय है — कभी नष्ट नहीं होता। और यह शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है, न किसी कर्म से लिप्त होता है।
जैसे कमल का फूल पानी में रहता है पर भीगता नहीं — उसी तरह परमात्मा देह में रहते हुए भी देह के कर्मों से, संसार की गंदगी से, अछूता रहता है।