📿 श्लोक संग्रह

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यात्

गीता 13.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥
यथा
जैसे
सर्वगतम्
सब जगह व्याप्त
सौक्ष्म्यात्
सूक्ष्म होने के कारण
आकाशम्
आकाश
न उपलिप्यते
लिप्त नहीं होता
सर्वत्र
सब जगह
अवस्थितः
स्थित
देहे
देह में
तथा
वैसे ही
आत्मा
आत्मा
न उपलिप्यते
लिप्त नहीं होती

यह श्लोक एक बहुत सुंदर उपमा देता है। आकाश सब जगह है — धूल-मिट्टी में भी, कीचड़ में भी, सुगंध में भी — पर आकाश खुद लिप्त नहीं होता। वह शुद्ध रहता है।

ठीक उसी तरह आत्मा इस देह में सब जगह व्याप्त है — पर देह के कर्मों से, सुख-दुःख से, लिप्त नहीं होती। आत्मा की यह अलिप्तता समझ में आ जाए तो बहुत बोझ हल्का हो जाता है।

आकाश की उपमा भारतीय दर्शन में बहुत प्रचलित है। छांदोग्योपनिषद और कठोपनिषद दोनों में आकाश को ब्रह्म या आत्मा के लिए उपमा के रूप में प्रयोग किया गया है।

गीता प्रेस पाठ में यह बत्तीसवाँ श्लोक है। अगला श्लोक (13.33) सूर्य की उपमा देता है — आत्मा क्षेत्र को कैसे प्रकाशित करती है।

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