कृष्ण यहाँ बहुत उदार बात कहते हैं। सब एक ही मंज़िल पर पहुँचते हैं, पर रास्ते अलग हो सकते हैं। कुछ लोग ध्यान से — मन को एकाग्र करके — आत्मा का दर्शन करते हैं।
दूसरे सांख्य-योग से — विवेक और विचार से। और कुछ कर्मयोग से — कर्तव्य-कर्म में ही परमात्मा को देखते हुए। तीनों मार्ग मान्य हैं। जो जिस स्वभाव का हो, वह वैसे चले।