यह श्लोक इस पूरे खंड का फल बताता है। जो इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को जान लेता है — वह किसी भी अवस्था में रहते हुए — चाहे गृहस्थ हो, चाहे साधु — फिर जन्म नहीं लेता।
'सर्वथा वर्तमानः' — किसी भी प्रकार से जीवन जी रहा हो — यह पद बहुत महत्वपूर्ण है। ज्ञान का यह फल किसी एक विशेष जीवन-शैली से बँधा नहीं है।