📿 श्लोक संग्रह

उपद्रष्टानुमन्ता च

गीता 13.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥
उपद्रष्टा
साक्षी रूप से देखने वाला
अनुमन्ता
अनुमति देने वाला
और
भर्ता
धारण करने वाला
भोक्ता
भोगने वाला
महेश्वरः
महान ईश्वर
परमात्मा
परमात्मा
इति
ऐसे
और
अपि
भी
उक्तः
कहा गया है
देहे
देह में
अस्मिन्
इस
पुरुषः परः
परम पुरुष

इस शरीर में जो परम पुरुष विराजमान है, उसके पाँच नाम यहाँ दिए गए हैं। उपद्रष्टा — जो देखता रहता है, साक्षी की तरह। अनुमंता — जो अनुमति देता है। भर्ता — जो धारण करता है। भोक्ता — जो अनुभव करता है। और महेश्वर — महान ईश्वर।

और वही परमात्मा है। यह सब नाम एक ही सत्ता के हैं जो इस देह में बसी है। जैसे घर में रहने वाला मेहमान, मालिक, रखवाला — सब एक ही हो सकता है।

यह श्लोक परमात्मा के विभिन्न पहलुओं को नाम देता है। 'उपद्रष्टा' — साक्षी — का भाव योग में द्रष्टा-भाव के रूप में ध्यान का आधार है।

गीता प्रेस पाठ में यह तेईसवाँ श्लोक है। यह और अगला श्लोक (13.24) मिलकर इस ज्ञान के फल की बात करते हैं।

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