📿 श्लोक संग्रह

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि

गीता 13.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥
पुरुषः
पुरुष (जीवात्मा)
प्रकृतिस्थः
प्रकृति में स्थित
हि
निश्चय ही
भुङ्क्ते
भोगता है
प्रकृतिजान्
प्रकृति से उत्पन्न
गुणान्
गुणों को
कारणम्
कारण
गुणसङ्गः
गुणों में आसक्ति
अस्य
इसका (जीव का)
सदसत्
अच्छी और बुरी
योनिजन्मसु
योनियों में जन्म लेने में

जब आत्मा प्रकृति में रहती है और उसके गुणों से चिपक जाती है — तब वह उन्हें भोगती है। और यही चिपकना — यही गुणों में आसक्ति — अच्छी और बुरी योनियों में जन्म का कारण बनती है।

सरल भाषा में — जैसे आम हो तो आम की टहनी पर, इमली हो तो इमली की टहनी पर। जो गुण पकड़े, वैसा जन्म। यह जन्म-बंधन का मूल कारण है।

यह श्लोक पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को प्रकृति-पुरुष के ढाँचे में समझाता है। गुणों में आसक्ति ही संसार-चक्र का कारण है — यह गीता का मूल संदेश है।

गीता प्रेस पाठ में यह बाईसवाँ श्लोक है। 'सदसद्योनि' — अच्छी और बुरी योनियाँ — सब प्रकार के जन्मों को दर्शाती हैं।

अध्याय 13 · 22 / 34
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