यहाँ दोनों की अलग-अलग भूमिका स्पष्ट की गई है। जो भी कार्य होता है, जो कारण-कार्य की श्रृंखला चलती है — उसका कर्ता प्रकृति है। प्रकृति ही करती है।
लेकिन सुख और दुःख का अनुभव पुरुष — आत्मा — करता है। यह एक सूक्ष्म भेद है। जैसे नाटक में पर्दा, प्रकाश, सज्जा — सब प्रकृति करती है। पर दर्शक — पुरुष — जो आनंद या दुःख अनुभव करता है, वह उसका अपना है।