यहाँ कृष्ण एक नए खंड में प्रवेश करते हैं। प्रकृति और पुरुष — दोनों अनादि हैं, दोनों का कोई आरंभ नहीं। यह बात महत्वपूर्ण है — न प्रकृति पहले थी, न पुरुष — दोनों सदा से हैं।
और जो विकार दिखते हैं — जैसे सुख-दुःख, अच्छे-बुरे भाव — और जो तीन गुण हैं — सत्व, रज, तम — ये सब प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। पुरुष — आत्मा — इनसे परे है।