📿 श्लोक संग्रह

प्रकृतिं पुरुषं चैव

गीता 13.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥
प्रकृतिम्
प्रकृति को
पुरुषम्
पुरुष (आत्मा) को
और
एव
ही
विद्धि
जानो
अनादी
अनादि
उभौ
दोनों
अपि
भी
विकारान्
विकारों को
गुणान्
गुणों को
और
एव
ही
प्रकृतिसम्भवान्
प्रकृति से उत्पन्न

यहाँ कृष्ण एक नए खंड में प्रवेश करते हैं। प्रकृति और पुरुष — दोनों अनादि हैं, दोनों का कोई आरंभ नहीं। यह बात महत्वपूर्ण है — न प्रकृति पहले थी, न पुरुष — दोनों सदा से हैं।

और जो विकार दिखते हैं — जैसे सुख-दुःख, अच्छे-बुरे भाव — और जो तीन गुण हैं — सत्व, रज, तम — ये सब प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। पुरुष — आत्मा — इनसे परे है।

यह श्लोक सांख्य दर्शन का आधार है। प्रकृति और पुरुष — ये दो मूल तत्व हैं जिनकी परस्पर क्रिया से सृष्टि होती है। भगवद्गीता इस दृष्टि को स्वीकार करते हुए उसे भक्ति से जोड़ती है।

गीता प्रेस पाठ में यह बीसवाँ श्लोक है। इस श्लोक के साथ प्रकृति-पुरुष विवेचन का खंड शुरू होता है।

अध्याय 13 · 20 / 34
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