📿 श्लोक संग्रह

कार्यकारणकर्तृत्वे

गीता 13.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
कार्यकारण
कार्य और कारण के
कर्तृत्वे
कर्तापन में
हेतुः
कारण
प्रकृतिः
प्रकृति
उच्यते
कही जाती है
पुरुषः
पुरुष (आत्मा)
सुखदुःखानाम्
सुख और दुःख के
भोक्तृत्वे
भोगने में
हेतुः
कारण
उच्यते
कहा जाता है

यहाँ दोनों की अलग-अलग भूमिका स्पष्ट की गई है। जो भी कार्य होता है, जो कारण-कार्य की श्रृंखला चलती है — उसका कर्ता प्रकृति है। प्रकृति ही करती है।

लेकिन सुख और दुःख का अनुभव पुरुष — आत्मा — करता है। यह एक सूक्ष्म भेद है। जैसे नाटक में पर्दा, प्रकाश, सज्जा — सब प्रकृति करती है। पर दर्शक — पुरुष — जो आनंद या दुःख अनुभव करता है, वह उसका अपना है।

यह श्लोक प्रकृति और पुरुष के कार्य-विभाजन को स्पष्ट करता है। इस विचार का गहरा प्रभाव योग और सांख्य दोनों परंपराओं पर रहा है।

गीता प्रेस पाठ में यह इक्कीसवाँ श्लोक है। 'भोक्तृत्व' — भोगने की शक्ति — को पुरुष का धर्म बताना एक दार्शनिक दृष्टि है जो संसार-बंधन की व्याख्या करती है।

अध्याय 13 · 21 / 34
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