📿 श्लोक संग्रह

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानम्

गीता 13.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥
इति
इस प्रकार
क्षेत्रम्
क्षेत्र
तथा
और
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञेयम्
ज्ञेय
भी
उक्तम्
कहा गया
समासतः
संक्षेप में
मद्भक्तः
मेरा भक्त
एतत्
यह
विज्ञाय
भली-भाँति जानकर
मद्भावाय
मेरे भाव को
उपपद्यते
प्राप्त होता है

कृष्ण यहाँ एक पड़ाव पर रुककर कहते हैं — इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय — तीनों संक्षेप में बताए गए। जो मेरा भक्त इन्हें भली-भाँति जान लेता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।

'मद्भाव' का अर्थ है — मेरे जैसा भाव, मेरी स्थिति। यह मोक्ष का एक कोमल शब्द है — जैसे गुरु कहे 'तुम मेरे जैसे हो जाओगे।' यह श्लोक ज्ञान और भक्ति को एक सूत्र में बाँधता है।

यह श्लोक अध्याय के पहले बड़े खंड का समापन करता है। 13.1 से 13.18 तक क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का वर्णन हुआ। इस श्लोक में उसका सार आया।

गीता प्रेस पाठ में यह उन्नीसवाँ श्लोक है। अगले श्लोकों (13.20 आगे) में प्रकृति और पुरुष का विचार आएगा।

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