यहाँ कृष्ण बहुत नाज़ुक बात कहते हैं। पुत्र में, पत्नी में, घर में — आसक्ति और ममता न रखना। यह रिश्ते छोड़ने की बात नहीं है। प्रेम करो, पर उसमें बंध मत जाओ।
और सुख आए या दुःख, जो इच्छित हो वह मिले या न मिले — मन सदा समान रहे। यह समचित्तता ज्ञान का एक और लक्षण है। जैसे झील का पानी तूफ़ान में भी गहरे में शांत रहता है।